| @This painting is copyright of Shivali. |
नभ के विशाल सीने पर मेघों का आवन,
मदहोश करती सीली पुरबा मनभावन,
तपते हिय को भिगोती बूंदों के आँचल में;
वो झंकार करता आया भीगा सा सावन।
हरियाली के सागर में बहते पृकृति के साए,
मयूरा की पीहू सूने आँगन को लुभाए,
सोलह-श्रिंगार करते यक्ष तरुओं की बाँहों में
वो सखियों संग झूले फिर स्मृति पर छाए।
झूले की मचलती पेंगो सी मेरी अल्हढ़ उमंग,
कभी धरा को छूती, कभी हैं नभ के संग,
कँही अंतर्मन के किसी कोने में सर छुपाये;
वो क्या जाने लगे हैं कितने झोंको के पंख।
वो क्या जाने लगे हैं कितने झोंको के पंख।

