Wednesday, 24 July 2013

स्वयं सारांश


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सांझ- सवेरे मेघा घेरे 
मनसा पंछी उड़-उड़ ले फेरे 
है तन जब श्रान्त, 
फिर मन क्यूँ चंचल, 
जैसे मृगतृष्णा कोई घेरे 
तैरे रिक्त वायू मण्डल में
मोहन सा वो ‘कुछ’ का दाना 
जो न पाने को दूर
और न खोने को पास है,
शायद कोई जिजीविषा 
या संतुष्टि भरा एहसास है? 
कुछ न कर पाने की तड़प
या कुछ कर जाने की चाह है?



इन्हीं तर्क-वितर्क के झोंकों तले 
श्रान्त पंख प्रतिपल कुचलें 
क्षण-क्षण एक सतत अभिलाषा 
फिर क्यूँ उसकी अग्नि में पिघले
भीगी पलकों की स्मित में झाँके 
क्यूँ उस ‘कुछ’ का काव्यांश,
जो स्वयं भ्रमित…......स्वयं समाये……….
स्वयं के भीतर……….स्वयं सारांश………..!!
                                                          -शिवाली