![]() |
| image@google |
सांझ- सवेरे मेघा घेरे
मनसा पंछी उड़-उड़ ले फेरे
है तन जब श्रान्त,
फिर मन क्यूँ चंचल,
जैसे मृगतृष्णा कोई
घेरे
तैरे रिक्त वायू मण्डल में
मोहन सा वो ‘कुछ’ का दाना
जो न पाने को दूर
और न खोने को पास है,
शायद कोई जिजीविषा
या संतुष्टि भरा एहसास है?
कुछ न कर पाने की तड़प
या कुछ कर जाने की चाह है?
इन्हीं तर्क-वितर्क के झोंकों तले
श्रान्त पंख प्रतिपल कुचलें
क्षण-क्षण एक सतत अभिलाषा
फिर क्यूँ उसकी अग्नि में पिघले
भीगी पलकों की स्मित में झाँके
क्यूँ उस ‘कुछ’
का काव्यांश,
जो स्वयं
भ्रमित…......स्वयं समाये……….
स्वयं के भीतर……….स्वयं सारांश………..!!
-शिवाली
