Thursday, 28 December 2017

धावक बनता जीवन,
ठहरने को आतुर
व्याकुल होती राहें,
साँझ मिले तो कैसे?
सूरज का उगना
नभ-पटल पर,
फैले कोहरे के जाले,
आँच मिले तो कैसे?
पाषाण प्रतिमा प्रिय की,
ह्रदय का पारदर्शी,
स्पर्श न जाने,
काँच न टूटे तो कैसे?
कल-कल गिरता
निष्ठुर पाप का झरना,
संग पुण्य बहता जाए,
साँच रूके तो कैसे?
-shivali dhaka

Sunday, 19 November 2017



Live painting on the theme 'woman empowerment' in
 HSS Fair,  Jaipur.


(Acrylic on canvas)