Sunday, 18 March 2018


थाह
"क्या कर रहे हो ?" वटवृक्ष को नीचे बिछी झील में एक-एक कर कंकड़ फैंकते देख सहमी-सकुचाई कोमलांगी लता ने हौले से पूछा I
"गहराई नाप रहा हूँ I" तटस्थ बने वृक्ष ने उत्तर दिया I
"कंकड़ से भी कोई गहराई का अनुमान लगाता है भला ?” लता ने हास करते हुए छेड़ा.
"नहीं, कंकड़ से नहीं, कंकड़ के गिरने से जो हलचल होती है, जो दायरा बनता है, बड़ा-छोटा, घुमावदार.........उससे I" इस बार वृक्ष ने पलट कर देखा, उसके अबोध प्रश्न पर एक और प्रश्नचिन्ह लगाते हुए....उसके ज्ञान को तुच्छ आँकते हुए I
"अच्छा ! तो क्या नाप सके तुम इस झील की रहस्यमयी गहराई को ?" लता ने तनिक सहमते-संभालते हुए पुन: पूछा I मानो वो भी ठान कर आई थी कि उस ग़ूढ हृदय के भीतर झाँक कर रहेगी; चाहे तो आँखों के छोटे झरोखों से या फिर नपे-तुले हुए शब्दों के मार्ग से सही I
"हाँ ! परंतु झील की नहीं, अपितु उस जल की जिसने स्वयं के ठहराव से इसे झील बनाया I क्या कम जल में कंकड़ डूब सकते थे? इसी की अथाह गहराई कंकड़ को ले डूबी. तो गहरा कौन-झील या उसमें भरा जल?” वृक्ष ने अपने ज्ञान पर गर्व करते हुए लता के मुख पर आते-जाते भाव को पढ़ने का प्रयास किया I
लता थोड़े समय के लिए जड़वत हो उसे देखती रही, फिर मुस्कराते हुए बोली, “हे विशालकाय वृक्षदेव ! अनुमान लगाना ही था तो मन की उस गहराई का लगाते जो पानी में गिरते हरेक कंकड़ के साथ अपने अंतस में एक नया भाव उत्पन्न करता है I सैकड़ों-हजारों खट्टी-मीठी अनुभूतियों को संगृहीत करता है I जिसमें प्रवेश करके हम डूबते-उतरते रहते हैं I संग में मस्तिष्क की थाह भी लेने का प्रयास कर लेते, जिसमें अगणित विचारों का प्रादुर्भाव करके एक नहीं, कई भँवर पैदा होते हैं, जिनमें डूबना सरल और निकलना कठिन हो जाता हैI या फिर उन दो आँखों की शक्ति की, जो बंद होकर भी समस्त प्रकृति को आत्मसात कर लेती है I सकल ब्रह्माण्ड को भीतर सहेज लेती हैं……..I”
यह कहते हुए लता इठलाती-बलखाती हुई समीप की सदियों पुरानी गाथा सुनाती खंडहर होती इमारत की दीवार पर चढ़ती चली गयीI
© Shivali Dhaka

Thursday, 28 December 2017

धावक बनता जीवन,
ठहरने को आतुर
व्याकुल होती राहें,
साँझ मिले तो कैसे?
सूरज का उगना
नभ-पटल पर,
फैले कोहरे के जाले,
आँच मिले तो कैसे?
पाषाण प्रतिमा प्रिय की,
ह्रदय का पारदर्शी,
स्पर्श न जाने,
काँच न टूटे तो कैसे?
कल-कल गिरता
निष्ठुर पाप का झरना,
संग पुण्य बहता जाए,
साँच रूके तो कैसे?
-shivali dhaka

Sunday, 19 November 2017



Live painting on the theme 'woman empowerment' in
 HSS Fair,  Jaipur.


(Acrylic on canvas)

 

Sunday, 15 June 2014

ढूँढ रही हूँ मैं.....

image@google

तुमने चाहा था देना
खुला आसमान सारा
और एक निर्विघ्न उड़ान 
मेरे कोमल पंखों को
पर ढूँढ रही हूँ मैं वो
बचपन का एक कोना
तुम्हारे काँधे पर फिर 
सिर रखकर सो जाने को.....
जहाँ गुनगुनाता हुआ 
हर स्वप्न सुरीला
तुम्हारी थपकीयों में
जागृत हो जाता था
हो जाती थी दूर मावस
जब तुम्हारे नेह का
पूर्ण चंद्र इठलाता था
हाँ, ढूँढ रही हूँ मैं वो 
तुम्हारी शाखों तले 
निश्चिंत हो सो जाना 
बाँधकर मौली में
अपने अबोध भय सारे वो......


© Shivali Dhaka




Sunday, 6 April 2014

‘Concrete’

@ painting by Shivali

Weary-dreary, sleepy-solemn
A path rolling down the concrete
Crushes under feet vague notions
Translates abstracts into ‘concrete’
Bumping into pits and hole
Incessantly heads ahead sole
As she could visualize that paradise
Which nests in mango orchard
On charpoy rests unheard
Hushes rich, hot flashes of summer,
quenches thirst from lips of poor earthen urn 
Oh!! Why throat is parched?
Why green is swallowed?
No side is found shaded
Laden with mangos mellowed!!
Falling upon head are mere the glares
Strolling down are feet, when she stares
On the same far-forlorn path
Rolling down the ‘concrete’……!!
                                          -Shivali


Thursday, 16 January 2014

मत्स्यकन्या

image@google
मचलती-फिसलती मत्स्यकन्या सी 

आकर ठहरी क्यों लहरों में,

हर श्वास का आवागमन है

क्यों ऋण समेटे जीवन में,

उलझी सी रिश्तों की हलचल

अन्यथा कोई ऋण कहाँ,

पसरी प्रश्नों की धूप तल-तल

बिछा न क्यों साया यहाँ,

उठती दृष्टि, तकती जल-थल

पूछती- क्या तुम दोगे उत्तर

या करेगा समाधान ये नभ……?

जो स्वयं बदलता रंग क्षण-क्षण,  

हो रक्ताभ मुख या श्यामल वर्ण

तो कभी उबटन मले हर कण-कण

श्रेष्ठता को करता प्रमाणित

                                                                                               हर ऋतु, हर स्वरुप में………।
                                                                                                                                       -शिवाली