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क्या कोई बताएगा मुझको
कहाँ है मेरे सपनों
की हद…..?
न खिंची कहीं चाहत की
कोई रेखा
न लगे कहीं शत्रुत्व
के कंटीले तार
न संतरी भय का, न वादों
का पहरा,
चारों दिशा में खुले
पड़े हैं द्वार
कभी गूंजती जहाँ ताल
परायी
कभी बजता अपना सा सितार
क्या कोई बतायेगा मुझको-
कौन सुनेगा इनके धुंधले
से शब्द……?
कभी आ जाते अतिथि अतीत
से
कभी भविष्य दिखलाता मोहिनी सूरत
कभी मिलते कई अजनबी…..हँसते-
गाते,
हाथ मिलाते...फिर दिखलाते
अपनी सीरत
कितनों को मैंने लुटते
देखा
कितनों ने लगाई अपनी
कीमत
क्या कोई बतायेगा मुझको-
कितनों को मैंने बचाया
किस हद…..?
जिन्हें लिखती रहीं
जाग-जाग कर
धवल तकिये पर उनींदी
रतियाँ
आई जब मिलन को भोर की
लाली
करते रहे पलकों से वो
बतियाँ
दिन चढ़ते ही हो गए कैद
धोखा दे गयीं खुद की
ही सखियाँ
क्या कोई बतायेगा इनको
शायद यही है इनकी गलती....
शायद यही इनकी सरहद….!

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