Sunday, 15 June 2014

ढूँढ रही हूँ मैं.....

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तुमने चाहा था देना
खुला आसमान सारा
और एक निर्विघ्न उड़ान 
मेरे कोमल पंखों को
पर ढूँढ रही हूँ मैं वो
बचपन का एक कोना
तुम्हारे काँधे पर फिर 
सिर रखकर सो जाने को.....
जहाँ गुनगुनाता हुआ 
हर स्वप्न सुरीला
तुम्हारी थपकीयों में
जागृत हो जाता था
हो जाती थी दूर मावस
जब तुम्हारे नेह का
पूर्ण चंद्र इठलाता था
हाँ, ढूँढ रही हूँ मैं वो 
तुम्हारी शाखों तले 
निश्चिंत हो सो जाना 
बाँधकर मौली में
अपने अबोध भय सारे वो......


© Shivali Dhaka




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