थाह
"क्या कर रहे हो
?" वटवृक्ष को नीचे बिछी झील में एक-एक कर कंकड़ फैंकते देख सहमी-सकुचाई कोमलांगी
लता ने हौले से पूछा I
"गहराई नाप रहा
हूँ I" तटस्थ बने वृक्ष ने उत्तर दिया I
"कंकड़ से भी कोई
गहराई का अनुमान लगाता है भला ?” लता ने हास करते हुए छेड़ा.
"नहीं, कंकड़ से
नहीं, कंकड़ के गिरने से जो हलचल होती है, जो दायरा बनता है, बड़ा-छोटा, घुमावदार.........उससे
I" इस बार वृक्ष ने पलट कर देखा, उसके अबोध प्रश्न पर एक और प्रश्नचिन्ह लगाते
हुए....उसके ज्ञान को तुच्छ आँकते हुए I
"अच्छा ! तो क्या
नाप सके तुम इस झील की रहस्यमयी गहराई को ?" लता ने तनिक सहमते-संभालते हुए पुन:
पूछा I मानो वो भी ठान कर आई थी कि उस ग़ूढ हृदय के भीतर झाँक कर रहेगी; चाहे तो आँखों
के छोटे झरोखों से या फिर नपे-तुले हुए शब्दों के मार्ग से सही I
"हाँ ! परंतु झील
की नहीं, अपितु उस जल की जिसने स्वयं के ठहराव से इसे झील बनाया I क्या कम जल में कंकड़
डूब सकते थे? इसी की अथाह गहराई कंकड़ को ले डूबी. तो गहरा कौन-झील या उसमें भरा जल?”
वृक्ष ने अपने ज्ञान पर गर्व करते हुए लता के मुख पर आते-जाते भाव को पढ़ने का प्रयास
किया I
लता थोड़े समय के लिए
जड़वत हो उसे देखती रही, फिर मुस्कराते हुए बोली, “हे विशालकाय वृक्षदेव ! अनुमान लगाना
ही था तो मन की उस गहराई का लगाते जो पानी में गिरते हरेक कंकड़ के साथ अपने अंतस में
एक नया भाव उत्पन्न करता
है I सैकड़ों-हजारों खट्टी-मीठी अनुभूतियों को संगृहीत करता है I जिसमें प्रवेश करके
हम डूबते-उतरते रहते हैं I संग में मस्तिष्क की थाह भी लेने का प्रयास कर लेते, जिसमें
अगणित विचारों का प्रादुर्भाव करके एक नहीं, कई भँवर पैदा होते हैं, जिनमें डूबना सरल
और निकलना कठिन हो जाता हैI या
फिर उन दो आँखों
की शक्ति की, जो बंद होकर
भी समस्त प्रकृति को आत्मसात कर लेती है I
सकल ब्रह्माण्ड को भीतर सहेज
लेती हैं……..I”
यह कहते हुए लता इठलाती-बलखाती
हुई समीप की सदियों पुरानी गाथा सुनाती खंडहर होती इमारत की दीवार पर चढ़ती चली गयीI
© Shivali Dhaka
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