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दूर क्षितिज का फैला
अनंत सुनहरा आँचल,
समेटे अंदर कितने
ये गोरे-काले बादल,
जो बरसने को बैचैन
जैसे अश्रु
भरे दो नैन
लगाये हुए सुख-दुःख का काजल….
जो मिल जाये कहीं से
इसका कोई छोर,
लपेटूँ
मैं तन पर
मन चाहे जिस ओर,
और रंग डालूँ उस की
पवित्रमय आभा में
ढलते जीवन की नव,
आकर्षक भोर….
काश! ये सच हो जाता
जीना कितना सरल हो जाता,
न कोई मन दूषित होता,
न कोइ तन बदरंग होता
कुछ मीठे अनुभवों
का,
कुछ संयोजित भावों
का
बस अनूठा सा कोई मिश्रण ही होता……
और होता सतरंगी लहरों
का एक
निश्छल समंदर,
हृदय होता जिसका
कोरा जैसे कोई
दर्पण,
समांने को आतुर
छवि उस सौंदर्य की
जो करने को
व्याकुल अलौकिक समर्पण……
-शिवाली

very nice...:)
ReplyDeleteThank you suhani... :)
ReplyDeleteThis is just awesome. great flow, great expression. keep up the good work.
ReplyDeleteThank you so much for encouraging me......:)
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