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तुम्हारे सान्निध्य की आँच तले
कभी पिघलती परछाई सी
भोर की गुनगुनी धूप में
कभी डोलती ओस की बूँद सी
बदल रही थी मैं पल-पल
होंठों पर मौन का रस टपकाए
बदल रही थी मैं हर-पल
पलकों पर लाज का बोझ उठाये
बदल रही हूँ इस पल भी
पर शब्दों को ढाल बनाये...
और बन गयी तुम
जैसी
स्वाभिमान की
देती गवाही
कहने को लिखती मेरी लेखनी
पर जिसमें है तुम्हारी अब स्याही
जाने-अनजाने स्व-अस्तित्व की
फिर नयी परिभाषा मैं खोलती हूँ
लोग यहाँ तक कहने
लगे कि-
तुम्हारी भाषा मैं अब बोलती हूँ....!!!!
-शिवाली

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