Few flowers of words from my basket dedicated to every Damini of country........
लगाऊँगी हवाओं के पर,
पर निकलूंगी जिस पिंजरे से बाहर
बुलाएगा फिर वही अंदर
क्या कभी सोचा था मैंने…..?
क्या कभी सोचा था मैंने…..?
फैलाऊँगी सुगंध प्रीत की
थामे स्वाभिमान का दामन
पर महकेगा जो घर मुझसे
मसली
जाऊँगी उसी आँगन
क्या कभी सोचा था मैंने….?
क्या कभी सोचा था मैंने….?
जलाऊँगी लौ बनकर
मैं बाती
छूने चलूंगी सूरज जिस दम,
पर दमकेगी जिस लौ में काया
पड़ जाएगी वही मद्धम
क्या कभी सोचा था मैंने……?
क्या कभी सोचा था मैंने……?
लिखूंगी धरती के काले घाव
रंगूँगी नभ का सफ़ेद अंग,
पर सजायेंगे जो रंग सपने
हो जायेंगे वही बदरंग
क्या कभी सोचा था मैंने…..?
क्या कभी सोचा था मैंने…..?
चमकूँगी बन दामिनी एक दिन
श्यामल घनेरे बादलों
के बीच,
पर टपका जाऊंगी एक चिंगारी
बुझते हुए अंगारों के बीच
क्या कभी सोचा था मैंने….?
क्या कभी सोचा था मैंने….?
क्या कभी सोचा था मैंने……???
-शिवाली

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