Wednesday, 3 October 2012

सपनों के जुगनू

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दिल के गलियारे में टिमटिमाते
अनगिनत सपनों के जुगनू
खुली आँखों से फिसल  जाये,
पलकों के परदे में बंद कर लिए।
फिर भी समय की धारा के साथ
  कुछ बह गएकुछ रह गए
आशा के भंवर में फंसने के बाद।
जो बह गए उन्हें बहने दिया
अपरिचित आकाश के नीचे
अनजान लहरों में भटकने को   
जहाँ  कोई पतवार थी   
 कोई किनारा था 
परन्तु डुबोने वाले हजार थे।

वो निश्छल थेनिर्मोही थे
बैरागी थे या सम्मोही थे 
जैसे थे वो सपने थे 
पर फिर भी मेरे अपने थे
 
जो अपनी नियति से हारे थे।

  जो पीछे रह गए वो
 संभल कर उड़ना सीख गए।
मौसमी हवा के वेग में 
दिशा बदलना सीख गए। 
रात के स्याह आवरण में जड़े
 
झिलमिलाते सितारों की तरह,
जीवन की उधड़ी राहों को
दिव्यता से अलंकृत कर गए,

 और छोड़ गए एक एहसास
 अनसुनी झंकार के साथ
एहसास एक लक्ष्य का,
 पूर्ति सम्भावना का,
अनवरत संघर्ष का,  
उपलब्धिपूर्ण भावना का........
                                  -
शिवाली 

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