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कितनी सरलता से कह गए तुम-
“छोड़ दो मुझे, उड़ जाओ कहीं
जैसे कोई अनभिज्ञ तुम!”
ये न सोचा उड़ सकूँगी कैसे;
बंधी हूँ जब तुम्हारे ही अंग
किसी अदृश्य मोह की डोर से,
जो खींचती है तुम्हारी तरफ
चहूँ दिशा की ओर से……
गर उसे तोड़ना भी चाहूँ
तो घायल होंगे मेरे ही पंख,
पर तुम क्या बच पाओगे,
पर तुम क्या बच पाओगे,
मेरी पीड़ा के दर्पण में
खुद को तड़पता पाओगे,
भीगी आहों की अग्नि में
भीगी आहों की अग्नि में
तुम जल कर रह जाओगे….
हाँ, तुम्हारे मन में लगी
एक क्षीण सी गांठ है,
अगर वो खोल दो तुम
तो उड़ने
लगोगे मेरे ही संग,
सांसारिक विपदाओं से भरे
जीवन के दोराहे को भूल,
क्षितिज की हदों से परे
जाने को कहीं दूर, बहुत दूर.......
- शिवाली

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