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| @Painting by Shivali |
समय न कोई डोर है
जिसका ओर या छोर है,
ये तो वो ठहरा पानी है
जिसके इठलाते बहाव का
नहीं होता एहसास भी,
बूँद-बूँद रिसता जाता है
जीवन के किसी अदृश्य
छिद्र की संकरी पगडण्डी से।
और रह जाते हैं हम
उन्हीं राहों में खड़े हुए,
प्रेम व स्नेह से भीगे हुए,
द्वेष की आंधी से लड़ते हुए,
थामे हुए स्मृतियों का हाथ,
फैला जहाँ स्वप्निल आकाश
द्वेष की आंधी से लड़ते हुए,
थामे हुए स्मृतियों का हाथ,
फैला जहाँ स्वप्निल आकाश
कठिनाई भरे मेघों के साथ।
चलना चाहें पर चल न पायें,
ठहरना चाहें, ठहर भी न पायें
बस धँसते जायें,
धँसते जायें,
कर्तव्यों के दलदल में,
ओढ़े मोह की रेशमी चादर …..
- शिवाली

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