Sunday, 14 October 2012

इठलाता समय


@Painting by Shivali
समय  कोई  डोर है
जिसका ओर या छोर है,
ये तो वो ठहरा पानी है
जिसके इठलाते बहाव का
नहीं होता एहसास भी,
बूँद-बूँद रिसता जाता  है  
जीवन के किसी अदृश्य 
छिद्र की संकरी पगडण्डी से।
और रह जाते हैं हम
उन्हीं राहों में खड़े हुए, 
प्रेम व स्नेह से भीगे हुए, 
द्वेष की आंधी से लड़ते हुए, 
थामे हुए स्मृतियों का हाथ, 

फैला जहाँ स्वप्निल आकाश 
कठिनाई भरे मेघों के साथ। 
चलना चाहें पर चल न पायें, 
ठहरना चाहें, ठहर भी न पायें
बस धँसते जायें,
धँसते जायें,
कर्तव्यों के दलदल में,
ओढ़े मोह की रेशमी चादर …..
                                  - शिवाली



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